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Archive | धर्म

शिव पूजा हर सुख देती है

Posted on 09 August 2010 by admin

सावन सोमवार को व्रत रखकर भगवान शिव की शास्त्रों में बताई विशेष विधि से पूजा शीघ्र फल देने वाली मानी गई है। जानते हैं क्या है सावन के सोमवार को शिव पूजा की यह विधि -

- श्रावण सोमवार को सूर्योदय के पहले जागें।
- घर का साफ-सफाई कर शरीर शुद्धि के लिए स्नान करें। सफेद वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर बैठें।
- स्नान के बाद गंगा जल, पवित्र नदी या जल स्त्रोत के जल से पूरे घर को पवित्र करें।
- घर में देवस्थान पर भगवान शिव-पार्वती और गणेश की मूर्ति पूजा के लिए स्थापित करें। - इसके बाद सबसे पहले व्रत संकल्प लें। मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये।
- इसके बाद प्रथम पूज्य देवता भगवान श्री गणेश का ध्यान और पूजा करें।
- श्री गणेश ध्यान और पूजा के बाद भगवान शिव ध्यान करने के लिए मंत्र का मन ही मन उच्चारण करें
- ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैव्र्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम॥
- ध्यान के बाद शिव के पंचाक्षरी या षडाक्षरी मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ से पार्वतीजी का षोडशोपचार पूजन करें।
- षोडशोपचार में सोलह प्रकार और सामग्रियों से देव आराधना की जाती है।
- शिव आराधना में विशेष रुप से बेल पत्र, भांग, धतूराए जल, दूध, दही, शहद, घी, चीनी, जनेऊ , चंदन, रोली, धूप, दीप और दक्षिणा को शामिल कर पूजा की जाती है।
- शिव-पार्वती पूजा के बाद सोमवार व्रत कथा का पाठ या श्रवण करना चाहिए।
- अंत में पूरी भक्ति और आस्था के साथ शिव आरती करें। प्रसाद वितरण करें। पूजा के दौरान हुए दोष के लिए क्षमा मांगे। अपनी कामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।
- सायंकाल प्रदोषकाल में भी शिव पूजा करें और रात्रि में भोजन करें। यथा संभव उपवास करें।
Vikas Sharma
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शिव की तीन आंखें क्यों हैं?

Posted on 09 August 2010 by admin

शिव अनोखेपन और विचित्रताओं का भंडार हैं। शिव की तीसरी आंख भी ऐसी ही है। धर्म शास्त्रों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं पर शिव की तीन आंखें हैं।

भगवान शिव अपने कर्मों से तो अद्भुत हैं ही; अपने स्वरूप से भी रहस्यमय हैं। भक्त से प्रसन्न हो जाएं तो अपना धाम उसे दे दें और यदि गुस्सा हो जाएं तो उससे उसका धाम छीन लें।

दरअसल शिव की तीसरी आंख प्रतीकात्मक नेत्र है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में पढऩे वाली मुसीबतों से सावधान करना।जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं; जिन्हें हम अपनी दोनों आंखों से भी नहीं देख पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस जरुरत है उसे जगाने की।

भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञाचक्र का स्थान है। यह आज्ञाचक्र ही विवेकबुद्धि का स्रोत है।

Vikas Sharma
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बद्रीनाथ के कपाट 19 मई को खुलगें

Posted on 13 May 2010 by admin

देहरादून - 3,300 मीटर ऊंचाई पर स्थित भगवान विष्णु को समर्पित बद्रीनाथ धाम  के कपाट ग्रीष्मकाल के लिए आगामी 19 मई को खुल रहे हैं, वैसे तो केदारनाथ धाम के कपाट 18 मई से खुल रहे हैं , चार धाम तीर्थयात्रा के दौरान इस बार तीर्थ यात्रियों को बद्रीनाथ में मुफ्त भोजन और प्रसाद देने की व्यवस्था की गई है।

बद्रीनाथ- केदारनाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष अनुसूया प्रसाद भट्ट ने बताया कि  बद्रीनाथ के कपाट ग्रीष्मकाल के लिए आगामी 19 मई को खुल रहे हैं। इस अवसर पर भीड़ को देखते हुए यात्रा मार्ग पर बिजली, पानी, आवास, यातायात, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था की स्थिति को दुरुस्त रखने के लिए जिला प्रशासन को आवश्यक सुके साथ निर्देश भी जारी किये गये हैं।

भट्ट ने बताया कि इस बार दर्शन के बाद प्रत्येक तीर्थ यात्री को मंदिर समिति की ओर से प्रसाद दिया जायेगा और चंदन का टीका भी लगाया जायेगा और मुफ्त में भोजन देने की व्यवस्था केदारनाथ और बद्रीनाथ में की जायेगी। इसके लिए विशेष भंडारे का आयोजन किया जाएगा। भट्ट ने बताया कि जो यात्री गर्भगृह के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहे होंगे उन्हें ठंड से बचने के लिए मुफ्त में चाय पिलाने की व्यवस्था की गई है।

उन्होंने कहा कि इस बार बद्रीनाथ में अलकनन्दा पर एक नया पुल बन जाने से यात्रियों को आने-जाने के लिए अलग-अलग मार्ग की सुविधा दी जायेगी। लोग एक पुल से आयेंगे तथा दर्शन करने के बाद दूसरे पुल से वापस चले जायेंगे।

उन्होंने कहा कि केदारनाथ में वीआईपी व्यक्तियों के आने से आम तीर्थयात्रियों को असुविधा न हो, इसके लिए गर्भगृह में प्रवेश के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इसके तहत 30 आम तीर्थयात्रियों के साथ एक वीआईपी को प्रवेश दिया जायेगा।

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पूर्णागिरि में पूर्ण होती मनोकामना

Posted on 20 March 2010 by admin

देवभूमि उत्तराखण्ड में स्थित अनेकों देवस्थलों में दैवीय-शक्ति व आस्था के अद्भुत केन्द्र बने पूर्णागिरि धाम की विशेषता ही कुछ और है। जहां अपनी मनोकामना लेकर लाखों लोग बिना किसी नियोजित प्रचार व आमन्त्रण के उमड पडते हैं जिसकी उपमा किसी भी लघु कुंभ से दी जा सकती है। टनकपुर से टुण्यास तक का सम्पूर्ण क्षेत्र जयकारों व गगनभेदी नारों से गूंज उठता है। वैष्णो देवी की ही भान्ति पूर्णागिरि मन्दिर भी सभी को अपनी ओर आकर्षित किए रहता है। हिन्दू हो या मुस्लिमए सिख हो या ईसाई, सभी पूर्णागिरि की महिमा को मन से स्वीकार करते हैं। देश के चारों दिशाओं में स्थित कालिकागिरि, हेमलागिरि व मल्लिकागिरि में मां पूर्णागिरि का यह शक्तिपीठ सर्वोपरि महत्व रखता है।

समुद्रतल से लगभग 3 हजार फीट ऊंची धारनुमा चट्टानी पहाड के पूर्वी छोर पर सिंहवासिनी माता पूर्णागिरि का मन्दिर है जिसकी प्रधान पीठों में गणना की जाती है। संगमरमरी पत्थरों से मण्डित मन्दिर हमेशा लाल वस्त्रोंए सुहाग.सामग्रीए चढावाए प्रसाद व धूप-बत्ती की गंध से भरा रहता है। माता का नाभिस्थल पत्थर से ढका है जिसका निचला छोर शारदा नदी तक गया है। देवी की मूर्ति के निकट स्थित इस स्थल पर ही भक्तगण प्रसाद चढाते व पूजा करते हैं। मन्दिर में प्रवेश करते ही कई मीटर दूर से पर्वत शिखर पर यात्रियों की सुरक्षा के लिए लगाई गई लोहे के लंबे पाइपों की रेलिंग पर रंग-बिरंगी पोलोथीन पन्नियों व लाल चीरों को बंधा देकर यात्रीगण विस्मित से रह जाते हैं। देवी व उनके भक्तों के बीच एक अलिखित अनुबंध की साक्षी ये रंग-बिरंगी लाल-पीली चीरें आस्था की महिमा का बखान करती हैं। मनोकामना पूरी होने पर फिर मन्दिर के दर्शन व आभार प्रकट करने और चीर की गांठ खोलने आने की मान्यता भी है।

टनकपुर से टुण्यास व मन्दिर तक रास्ते भर सौर ऊर्जा से जगमगाती ट्यूबलाइटें, सजी-धजी दुकानें, स्टीरियो पर गूंजते भक्तिगीत, मार्ग में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं, देवी के छन्द गाती गुजरती स्त्रियों के समूह सभी कुछ जंगल में मंगल सा अनोखा दृश्य उपस्थित करते हैं। रात हो या दिन चौबीस घंटे मन्दिर में लंबी कतारें लगी रहती हैं। मस्तक पर लाल चूनर बांध या कलाई में लपेटे भूख प्यास की चिन्ता किए बिना जोर.जोर से जयकारे लगाते लोगों की श्रद्धा व आध्यात्मिक अनुशासन की अद्भुत मिसाल यहां बस देखते ही बनती है।

चारों ओर बिखरा प्राकृतिक सौन्दर्य ऊंची चोटी पर अनादि काल से स्थित माता पूर्णागिरि का मन्दिर व वहां के रमणीक दृश्य तो स्वर्ग की मधुर कल्पना को ही साकार कर देते हैं। नीले आकाश को छूती शिवालिक पर्वत मालाएं, धरती में धंसी गहरी घाटियां, शारदा घाटी में मां के चरणों का प्रक्षालन करती कल-कल निनाद करती पतित पावनी सरयूए मन्द गति से बहता समीरए धवल आसमानए वृक्षों की लंबी कतारेंए पक्षियों का कलरव, सभी कुछ अपनी ओर आकर्षित किए बिना नहीं रहते। चैत्र व शारदीय नवरात्र प्रारंभ होते ही लंबे.लंबे बांसों पर लगी लाल पताकाएं हाथों में लिए सजे धजे देवी के डोले व चिमटा, खडताल मजीरा, ढोलक बजाते लोगों की भीड से भरी मिनी रथ यात्राएं देखते ही बनती हैं। वैसे श्रद्धालुओं का तो वर्ष भर आवागमन लगा ही रहता है। यहां तक कि नए सालए नए संकल्पों का स्वागत करने भी युवाओं की भीड हजारों की संख्या में मन्दिर में पहुंच साल की आखिरी रात गा.बजा कर नए वर्ष में इष्ट मित्रों व परिजनों के सुखए स्वास्थ व सफलता की कामना करती हैं।


Vikas Sharma
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महाकुंभ- शाही स्नान पर्व पर लाखों श्रद्धालुओं ने लगाई ढुबकी

Posted on 15 March 2010 by admin

आस्था सब पर भारी पड रही है

महाकुंभ - हरिद्वार में चल रहे महाकुंभ सोमवती अमावस्या के दूसरे शाही स्नान  पर्व पर आज 65 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं ने गंगा में डुबकी लगाई।  हर की पौडी, मालवीय द्वीप, सुभाष घाट, गऊघाट पर बीतीरात बारह बजे से ही स्नान शुरू हो गया था। सैकड़ों वर्ष बाद महाकुंभ पर सोमवती अमावस्या पर्व के इस दुर्लभ संयोग के कारण आज के स्नान का महत्व काफी बढ़ गया था। जिसके कारण अपार भीड़ महाकुंभ मेला हरिद्वार में पहुंच गई थी।

देश के विभिन्न प्रांतों से महाकुंभ के दूसरे शाही स्नान  पर्व पर आज लाखों श्रद्धालुओं के अलावा विदेशो से भी भारी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंच चुके हैं। हरिद्वार में समूचे कुंभ क्षेत्न में चारों तरफ यात्नियों की आवाजाही दिखायी पड़ रही है।
सोमवती अमावस्या में धर्मनगरी पहुंचे लाखों तीर्थ यात्रियों आवागमन में दिक्कतें उठानी पड़ रही है। सोमवती अमावस्या में भारी भीड़ जुटने की संभावना पर मेला प्रशासन ने पहले से ही इंतजाम कर रखे थे।

हरिद्वार के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि गंगा की आरती के दर्शन से श्रद्धालुओं को वंचित कर दिया गया। 12वें अखाड़े नया उदासीन द्वारा शाही स्नान के बाद निर्मल अखाड़े द्वारा स्नान शुरू करने से पहले हरकी पैड़ी मैनेजमेंट संस्था के कुछ पुरोहितों ने सूने घाटों पर आरती की रस्म पूरी की। हरकी पौड़ी के मंदिरों पर सुबह से प्रशासन के आदेश से ताले लटके रहे, जो आरती के समय भी लगे हुए थे।

भीड़ के कारण यात्नियों को कई किलोमीटर पहले ही रोककर निर्धारित मार्गो से भेजा जा रहा है। प्रशासन की रणनीति श्रद्धालुओं को हर की पौडी से अलग घाटों पर भेजने की रही है। जिससे हर की पौडी पर भीड़ का दबाव न बन सके। प्राप्त जानकारी के अनुसार सभी वाहनों को शहर के विभिन्न क्षेत्नों में बनी पार्किग में खड़ा किया जा रहा है जहां से पैदल ही यात्नियों को स्नान घाटों की तरफ जाना पड़ रहा है। रिक्शा, तांगा तक बंद होने के कारण यात्नियों को सामान भी पैदल सर पर ढोना पड़ रहा है।

बच्चे, बूढे जवान, महिलाएं महाकुंभ के इस दुर्लभ संयोग के चलते सोमवती स्नान के लिए 10 से 12 किलोमीटर पैदल चल कर भी स्नान के लिए हर की पौडी पहुंच रहे हैं। आज हर की पौडी से ज्वालापुर-भीमगोडा तक करीब 10 किलोमीटर तक लंबे घाटों पर हर जगह यात्नी स्नान करते नजर आ रहे हैं। प्रशासन ने स्नान के लिए भारी सुरक्षा व्यवस्था की है। हरिद्वार में चारों ओर पुलिस व अर्धसैनिक बलों ने मोर्चा संभाल रखा है।

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महाशिवरात्रि दिन शिवलिंग की उत्पत्ति..

Posted on 11 February 2010 by admin

शिव पुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग की उत्पत्ति हुई थी, इसीलिए इस दिन किया गया शिव पूजन, व्रत और उपवास अनंत फल दायी होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार श्रध्दालु भक्त अपनी राशि के अनुसार भी भगवान शिव की आराधना और पूजन कर मनोवांछित फल प्राप्त कर सकते हैं । महाशिव रात्रि के दिन किसी भी राशि का जातक पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक कर सफेद अर्क के फूल चढ़ाकर चंदन से प्रणव (ॐ) बनाकर भी उपासना कर सकते हैं ।

तिल स्नान कर करें शिव पूजा- फागुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को महाशिव रात्रि महोत्सव मनाया जाता है । त्रयोदशी को एक बार भोजन करके चतुर्दशी को दिन भर अनन नहीं ग्रहण करना चाहिए । इसके अलावा यह भी मान्यता है कि काले तिलों से स्नान करके रात्रि में विधिवत शिव पूजन करना चाहिए । भगवान शिव के सबसे प्रिय पुष्पों में कनेर, बेल पत्र तथा मौलसिरी है । लेकिन पूजन विधान में बेलपत्र सबसे प्रमुख है । शिवजी पर पका आम चढ़ाने से विशेष फल प्राप्त होता है ।

लोक मंगलकारी है रूद्र शिव- शिवलिंग पर चढ़ाए गए पुष्प, फल तथा जल को नहीं ग्रहण करना चाहिए । भघवान ब्रह्मा जी की तीन शक्तियों में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का नाम उल्लेखनीय है। इन्हीं शक्तियों मे ंएक रूलाने के कारम रूद्र तथा दूसरा जगत कल्याण करने के कारण शिवके नाम से जाना जाता है। सामान्यत: देखने में दोनों नाम परस्पर विरोधी लगते हैं मगर सृष्टिक्रम के अनुसार लोक मंगलकारी है ।

मेष - गुड़ के जल से अभिषेक करे । मीठी रोटी का भोग चढ़ाएं लाल चंदन व कनेर की फूल से पूजा करें ।
वृष- दही से अभिषेत करे। शक्कर, चांवल, सफेद चंदन सफेद फूल से पूजा करे ।
मिथुन - गन्ने के रस से भगवान का अभिषेक करें. मुंग , दूब और कुशा से पूजा करे ।
कर्क - घी से अभिषेत कर चावल, कच्चा दूध, सफेद आक व शखपुष्पी से शिवलिंग की पूजा करें ।
सिंह - गुड़ के जल से अभिषेक कर गुड़ व चावल से बनी खीर का भोग लाकर गेहूं के चूरे और मंदार के फूल से पूजा करें ।
कन्या - गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेत करे । भगवान शंकर को भांग, दूब व पान अर्पित करे ।
तुला - सुगंधित तेल या इत्र से भगवान का अभिषेक कर दही, मधुरस व श्रीखंड का भोग लगाएं । सफेद फूल से भगवान की पूजा करें ।
वृश्चिक - पंचामृत से अभिषेत करे । लाल गोझिया फूल से भगवान की पूजा करें ।
धनु - हल्दी युक्त दूध से अभिषेत कर केश्री और बेसन से बनी मिठाई से भगवान का भोग लगाएं । गेंदे के फूल से उनकी पूजा करें ।
मकर - नारियल पानी से अभिषेक कर उड़द से बनी मिठआई का भगवान को भोग लगाएं । नीलकमल के फूल उनकी पूजा करे ।
कूंभ - तिल के तेल से अभिषेक कर उड़द से बनी मिठआई का भोग लगाए । शमी के फूल से भगवान की पूजा करे ।
मीन - केसरयुक्त दूध से भगवान का अभिषेक कर दही भात का भोग लगाएं । पीली सरसों और नागकेसर से भगवान की पूजा करें ।

‘स्मृत्यंतर’ में कहा गया है कि शिवरात्रि में चतुर्दशी प्रदोषव्यापिनी ग्रहण करें। यहां प्रदोष शब्द से मतलब ‘रात्रि का ग्रहण’ है। अत: रात्रि में जागरण करें और उसमें उपवास करें। उत्तरार्ध में उसका कारण बताया गया है। ‘कामिक’ में भी कहा गया है कि सूर्य के अस्त समय यदि चतुर्दशी हो, तो उस रात्रि को ‘शिवरात्रि’ कहते हैं। यह उत्तमोत्तम होती है। आधी रात के पहले और आधी रात के बाद यदि चतुर्दशी युक्त न हो, तो व्रत को न करें, क्योंकि ऐसे समय में व्रत करने से आयु और ऐश्वर्य की हानि होती है। माधव मत से ‘ईशान संहिता’ में कहा गया है कि जिस तिथि में आधी रात को चतुर्दशी की प्राप्ति होती है, उसी तिथि में मेरी प्रसन्नता से मनुष्य अपनी कामनाओं के लिए व्रत करें।

विधि-विधान

महाशिवरात्रि का व्रत सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और प्रत्येक समुदाय के स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्ध के लिए मान्य है। अत: आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति मंत्रों और पूजा विधि का ज्ञान रखता हो। अपने भक्ति भाव और श्रद्धा के अनुसार शिव पूजन कर सकते हैं। धन का सार्मथ्य हो, तो किसी ब्राह्मण से विधि-विधान से पूजन कराएं। रुद्राभिषेक, रुदी पाठ, पंचाक्षर मंत्र का जाप आदि कराएं। व्रत करने वाली स्त्री को इस दिन प्रात: स्नानादि के बाद दिनभर शिव का स्मरण करना चाहिए। सायंकाल में पुन: स्नान करके भस्म का त्रिपुंड और रुदाक्ष की माला धारण करें। इसके बाद धूप, पुष्पादि व अन्य पूजन सामग्री सहित शिव के समीप पूर्व या उत्तर की तरफ मुख करके बैठें। शिवजी का यथाविधि पूजन करें। रात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान तथा ‘ओम हीं ईशानाय नम:’ का जाप करें। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके ‘ओम् हीं अधोराय नम:’ का जाप करें। तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र ‘ओम हीं वामदेवाय नम:’ तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं ‘ओम् हीं सद्योजाताय नम:’ मंत्र का जाप करें।

सम्पूर्ण पूजा विधि के दौरान ‘ओम नम: शिवाय’ एवं ‘शिवाय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्धोदक स्नान, अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उवपसत्र, बिल्व पत्र, नाना परिमल दव्य, धूप दीप नैवेद्य करोद्वर्तन (चंदन का लेप) ऋतुफल, तांबूल-पुंगीफल, दक्षिणा उपर्युक्त उपचार कर ‘समर्पयामि’ कहकर पूजा संपन्न करें। कपूर आदि से आरती पूर्ण कर प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, शाष्टांग प्रणाम कर पूजन कर्म शिवार्पण करें। चारों प्रहर का पूजन अवश्य करें।

शिवरात्रि के व्रत की विशेषता है कि इस व्रत का पारण चतुर्दशी में ही करना चाहिए। यह पूर्वाद्धि (प्रदोषनिशीथी) चतुर्दशी होने से ही हो सकता है, जो महाशिवरात्रि पर होती है। जो व्यक्ति संपूर्ण विधि से व्रत करने में असमर्थ हों, वे रात्रि के आरंभ में तथा अर्द्धरात्रि में भगवान शिव का पूजन करके व्रत पूर्ण कर सकते हैं। यदि इस विधि से भी व्रत नहीं कर सकें, तो पूरे दिन व्रत करके सायंकाल में भगवान शंकर की यथाशक्ति पूजा-अर्चना करके भी व्रत पूर्ण कर सकते हैं। इस तरह भी भगवान शिव की कृपा से जीवन में सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।

कथा और मान्यताएं
नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि ऋषियों ने सूत जी को प्रणाम कर शिवरात्रि व्रत के संबंध में प्रश्न किया, ‘हे सूत जी! पूर्व काल में किसने इस उत्तम शिवरात्रि व्रत का पालन किया था और अनजान में भी इस व्रत का पालन करके किसने कौन-सा फल प्राप्त किया था? इसका उत्तर उन्हें ऐसे मिला -’एक धनवान मनुष्य शिवरात्रि के दिन शिव मंदिर में गया। एक सौभाग्यवती स्त्री वहां पूजन में लीन थी। धनिक ने उसके आभूषण चुरा लिए। लोगों ने उसके कृत्य से क्षुब्ध होकर उसे मार डाला, किंतु चोरी करने के लिए धनिक आठों प्रहर भूखा-प्यासा जागता रहा था, इसी कारण स्वत: व्रत हो जाने से शिवजी ने उसे सद्गति दी।

फल
‘स्कन्दपुराण’ में कहा गया है, ‘हे देवी, मेरा जो भक्त शिवरात्रि में उपवास करता है, उसे क्षय न होने वाला दिव्य गण बनाता हूं। वह सब महाभोगों को भोगकर अंत में मोक्ष पाता है।’

‘ईशान संहिता’ के अनुसार, यह व्रत सब पापों का शमन करने वाला है। यह 12 से 24 वर्ष के पापों का नाश करता है। यह मनुष्यों को भक्ति-मुक्ति देने वाला है। जो मनुष्य शिवरात्रि पर अखंडित व्रत करता है, उसकी सारी इच्छाएं पूर्ण होती हैं तथा वह शिव के साथ आनंद करता है। जो पुरुष व्रत से हीन होकर भी किसी विशेष उद्देश्य से शिवरात्रि में जागरण करता है, वह रुद्र के बराबर होता है।

सम्पूर्ण शास्त्रों में शिवरात्रि व्रत को सबसे उत्तम बताया गया है। कहा गया है कि यह व्रत परम मंगलमय और दिव्यतापूर्ण है। इससे सदा सर्वदा भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में यह व्रत ‘व्रतराज’ के नाम से विख्यात है और चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। संभव हो, तो उक्त व्रत को जीवन पर्यंत करें, अन्यथा 14 वर्ष के बाद पूर्ण विधि-विधान के साथ इसका उद्यापन कर दें।

यह व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहिए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है और भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।


Vikas Sharma
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मेला प्रशासन की अगली परीक्षा 20 जनवरी बसंत पंचमी को

Posted on 17 January 2010 by admin

हरिद्वार-मकर संक्रांति और मौनी अमावस्या पर श्रद्धालुओं की भीड़ निकल चुकी ह,हरकी पैड़ी पर सन्नाटा है। सफाई व्यवस्था को दुरुस्त कर घाटों को  साफ किया जा चुका है। सामान्य वर्षो में मकर संक्रांति के बाद जिला प्रशासन के लिए महाशिवरात्रि का स्नान चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन महाकुंभ के कारण बसंत पंचमी का स्नान बेहद महत्वपृर्ण हो गया है। इसलिए मेला और पुलिस प्रशासन अभी से तैयारियों में जुट गया है। अगली परीक्षा 20 जनवरी बसंत पंचमी को है। मेला प्रशासन भी महाशिवरात्रि पर शाही स्नान से पूर्व इसे ट्रायल के रूप में मान रहा है।

महाकुंभ का आगाज चौदह जनवरी को हो गया था। अगले ही दिन सूर्यग्रहण भी था। इसलिए तीर्थनगरी में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।  मेला प्रशासन हरिद्वार से ऋषिकेश तक गंगा घाटों पर स्नान करने वालों की संख्या 17 लाख बता रहा है। बसंत पंचमी  के दिन स्थानीय और कुछ पड़ोसी जनपदों से गंगा घाट पर डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार महाकुंभ के दौरान यह स्नान पर्व पड़ रहा है, इसलिए मेला प्रशासन और पुलिस प्रशासन अभी से तैयारियों में जुट गया है। मेला प्रशासन को अब एक और परीक्षा  बीस जनवरी को देनी है। मकर संक्रांति के बाद जिला और पुलिस प्रशासन तीर्थनगरी में महाशिवरात्रि के स्नान पर्व के लिए कमर कसता था, लेकिन महाकुंभ वर्ष में बसंत पंचमी और माघ पूर्णिमा (30 जनवरी) की चुनौती से भी निपटना होगा।

महाकुंभ का पहला शाही स्नान 12 फरवरी को  है लिहाजा इस स्नान पर्व से पहले पड़ने वाले सभी स्नान मेला प्रशासन के लिए एक तरह से ट्रायल साबित होंगे। सुरक्षा इंतजाम, यातायात प्लान सहित सभी को लेकर व्यवस्था ‘रिव्यू’ करने का मौका देगा ताकि महाकुंभ के पहले शाही स्नान को संपन्न कराया जा सके। मेलाधिकारी आनंद ब‌र्द्धन और मेला डीआईजी आलोक कुमार शर्मा ने जानकारी दी कि निश्चित रूप से कुंभ वर्ष में बसंत पंचमी का स्नान होने की वजह से इसका विशेष महत्व है। मेला प्रशासन गंगा घाट पर डुबकी लगाने के लिए श्रद्धालु को परेसानी हो ,इसकी तैयारियों में जुट गया है।

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गंगा मैया की सुबह की आरती टाली

Posted on 15 January 2010 by admin

हरिद्वार- कुंभ पर्व के दौरान मौनी अमावस्या में ठीक पांच सौ पैंसठ साल बाद बन रहे सूर्यग्रहण के अद्भुत संयोग को देखते हुए कुंभ का सूतक आरंभ होने से पूर्व कुंभनगरी में मंदिरों के कपाट बंद कर दिए गए। साथ ही प्रभात की बेला में होने वाली गंगा मैया की आरती भी स्थगित कर दी गई। इससे पूर्व गुरुवार को सांध्यकाल में हर की पैड़ी पर मां गंगा की भव्य आरती हुई।

कुंभनगरी में सूर्य पर ग्रहण का स्पर्श आज 11 बजकर 58 मिनट 30 सेकेंड पर होगा। ग्रहण का मोक्षकाल तीन बजकर 11 मिनट 59 सेकेंड पर है। इस अवधि में मंदिरों के कपाट बंद रहेंगे और किसी तरह की पूजा-अर्चना भी नहीं होगी। ग्रहण के निष्प्रभावी होने पर ही स्नानादि के बाद मंदिरों के कपाट दर्शनार्थियों के लिए खोले जाएंगे। ज्योतिष गणना के अनुसार ग्रहण का सूतक उसके स्पर्श से 12 घंटे पूर्व आरंभ हो जाता है और इसी अवधि में सुबह की आरती भी होनी है। इसलिए गंगा सभा ने आरती को स्थगित रखने का निर्णय लिया है। सूतक काल से पूर्व गुरुवार को शाम पांच बजकर 40 मिनट पर हर की पैड़ी पर मां गंगा की भव्य आरती हुई, जिसके दर्शनों को वहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।

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मकर संक्रांति: 1033 साल बाद आयेगा ऐसा योग…

Posted on 11 January 2010 by admin

मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और कंकण सूर्य ग्रहण इस बार एक ही दिन पड़ रहे हैं। मकर संक्रांति पर्व 14 जनवरी से प्रारंभ होकर 15 जनवरी सुबह 5 बजे तक है। वहीं 14 जनवरी को सुबह 10:11 बजे से मौनी अमावस्या शुरू हो जाएगी, जो 15 जनवरी को दोपहर 12.41 बजे तक रहेगी। तीनों पर्व का योग करीब एक हजार साल बाद बन रहा है। 15 जनवरी को कंकण संक्रांति भी है। इन तीनों का योग और कंकण सूर्य ग्रहण शुक्रवार को पड़ने तथा अन्य ग्रह के वक्री चलने से एक माह के भीतर तेज हवा के साथ वर्षा और ओले गिरने की संभावना है। 15 जनवरी को तीनों का यह दुर्लभ योग एक हजार साल बाद बन रहा है। इसके बाद अगला योग 1033 साल बाद यानी 24 दिसंबर 3043 को पड़ेगा। पितृदोष शांति तथा तंत्र, मंत्र की सिद्धि के लिए भी यह दिन अति महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। आमतौर पर मकर संक्रांति तथा मौनी अमावस्या में लगभग एक पखवारे का अंतर होता रहा है, लेकिन इस बार दोनों का योग साथ-साथ है। यह योग 20 साल बाद आया है पिछला योग 14 जनवरी 1990 को था। अब दोनों का अगला योग 14 जनवरी 2028 को बनेगा। संयोग से इसी दिन कंकण सूर्य ग्रहण भी पड़ रहा है। ये तीनों एक हजार साल बाद एक ही दिन पड़ रहे हैं। खगोल शास्त्रियों के लिए यह दिन काफी महत्वपूर्ण रहता है, इस दिन तीनों के योग से वातावरण पर असर डालने वाले तत्वों पर वे शोध करते हैं। ज्योतिषाचार्य विजय भूषण वेदार्थी ने बताया कि कंकण सूर्य ग्रहण के लिए ग्वालियर-चंबल संभाग में सूतक 14 जनवरी की रात्रि 11 बजे लग जाएगा। ग्वालियर में सूर्य ग्रहण का स्पर्श 15 जनवरी की सुबह 11:50 बजे और मोक्ष दोपहर 3:14 बजे होगा। परम ग्रास 59 प्रतिशत होगा। यह ग्रहण उत्तराषाढ़ नक्षत्र एवं मकर राशि में घटित होने के कारण इस नक्षत्र एवं मकर राशि वाले व्यक्तियों को विशेष कष्टकारक रहेगा।

ज्योतिर्विद का कहना है कि यूं तो हर माह सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है और इस प्रवेश के समय को संक्रमण काल कहते हैं। इसी से संक्रांति शब्द बना है। कर्क, तुला और मकर तीन बड़ी संक्रांति होती है जिसमें मकर संक्रांति सबसे महत्वपूर्ण है। इस बार 14 जनवरी को सूर्य दोपहर 12:36 बजे मकर राशि में संक्रमण कर रहा है। निर्णय सिंधु में कहा गया है कि यदि दिन में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करे तो पूरा दिन और 16 घंटे तक मकर संक्रांति का पर्व काल रहता है।

सबसे बड़ा कंकण सूर्य ग्रहण

ज्योतिर्विद का कहना है कि 22 जुलाई 2009 को सदी का सबसे बड़ा पूर्ण सूर्य ग्रहण था। इसके सात माह बाद ही 15 जनवरी को इसी सदी का सबसे बड़ा कंकण सूर्य ग्रहण होने जा रहा है। इसके बाद इतना लंबा कंकण सूर्य ग्रहण 1033 वर्ष बाद यानी 24 दिसंबर 3043 को दिखाई देगा।


Vikas Sharma
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अकबर हरिद्वार से गंगाजल मंगवाते थे

Posted on 09 January 2010 by admin

हरिद्वार-cheeni-ab यूं ही देश दुनिया के लोग हरिद्वार के गंगाजल के कायल नहीं हैं। आज भी हरिद्वार के गंगाजल को लेने के लिए देश दुनिया से श्रद्धालु पहुंचते हैं। गंगाजल के कायल तो मुगल काल के सम्राट अकबर भी थे। यही नहीं, हरिद्वार में ही महाभारत के कई लोगों ने देह का त्याग भी किया था।

यह सर्वमान्य तथ्य है कि युगों पूर्व भगीरथ गंगा की धारा को धरती पर लाये थे। भगीरथ गंगा की धारा को हिमालय के जिस मार्ग से लेकर मैदान में आए वह मार्ग जीवनदायिनी दिव्य औषधियों वनस्पतियों से भरा हुआ था। इस कारण भी गंगाजल को अमृत तुल्य माना जाता है। धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा का अपना विशेष आध्यात्मिक महात्म्य है। हरिद्वार, प्रयाग, अवन्तिका नासिक इन चार जगहों पर महाकुंभ की परंपरा सदियों पुरानी है। आज भी इन चारों जगहों पर आयोजित होने वाले महाकुंभ में जीवन का जो विराट स्वरूप दिखाई देता है, वह अन्य कहीं दुर्लभ है। सबसे पहले गंगा जहां हिमालय के शिखर से उतरती है वह स्थान गंगा महाद्वार कहलाता है और गंगा जहां पर्वत मालाओं से निकलकर समतल मैदान में आती है उसे गंगाद्वार कहते हैं। इसी को हरिद्वार के नाम से जाना जाता है। गंगा के हरिद्वार तक आते-आते भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा की धारा एक हो जाती हैं। इसमें अन्य जल स्रोत भी मिल जाते हैं। प्रयाग, काशी होते हुई लगभग 1560 मील की दूरी तय कर गंगा बंगाल की खाड़ी में समुद्र में विलीन हो जाती है। गंगा हरिद्वार में पहुंचकर ही सबसे पहले तीर्थ बनी। यही कारण है कि तीर्थो में हरिद्वार का महत्व प्रतिपादित किया गया है। पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है। नारदीयपुराण में तीर्थयात्रा की विधि का उल्लेख करते हुए प्रयाग, कुरुक्षेत्र हरिद्वार तीर्थ का विशेष महत्व बताया गया है। वहीं, आइन--अकबरी के मुताबिक अकबर अपने दैनिक जीवन में गंगाजल का प्रयोग करता था। हरिद्वार से प्रतिदिन सीलबंद घड़ों में गंगा जल ऊंटों से दिल्ली-आगरा भी ले जाया जाता था।

महाभारत काल में गंगा को श्राद्ध के लिए सर्वोत्तम माना गया था। भीष्मपितामह ने हरिद्वार में अपने पिता का श्राद्ध किया था और धृतराष्ट्र, गांधारी कुंती ने हरिद्वार में गंगा में देह त्यागी थी। आज भी हरिद्वार में अस्थि विसर्जित करने की परंपरा है। तमाम ऐतिहासिक तथ्य हरिद्वार में बहती गंगा के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक महात्म्य को को प्रमाणित करते हैं। महाकुंभ के दौरान करोड़ों श्रद्धालु इससे पुण्य अर्जित करेंगे।
Vikas Sharma
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